Tuesday, 30 July 2013

भारत में पर्यावरण चेतना

           आदि युग से हम अपने धार्मिक संस्कारों की वजह से प्रकृति के कारकों के प्रति संवेदनशील रहे हैं। अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में लिखा है - "हे पृथ्वी माँ, मैं तुमसे उतना ही लूँगा, जिसे तू पुनः पैदा कर सके। तेरे मर्मस्थल पर या तेरी जीवन शक्ति पर कभी आघात नहीं करूंगा।" इस तरह के संस्कार भारतीयता की रीढ़ रहे हैं ; और यही वह कारण रहे हैं जिससे हमारा पर्यावरण इतने लंबे समय तक संरक्षित रहा है। भारत में पर्यावरण चेतना के कुछ विशिष्ट उदाहरण द्रष्टव्य हैं-

1. चिपको आंदोलन - पर्यावरण के प्रति दोस्ती का हाथ बढ़ाने वाले डॉ. सुंदर लाल बहुगुणा के नेतृत्व में सन    1973 में उत्तराखंड के चमोली जिले में आंदोलन प्रारम्भ हुआ जिसका प्रथम लक्ष्य वृक्षों की रक्षा करना तथा बाद में समस्त पर्यावरणीय संसाधनों का संरक्षण हो गया।

2. एप्पिको आंदोलन - कर्नाटक राज्य में श्री पांडुरंग हेगड़े ने चिपको आन्दोलन के ही अनुरूप एक आंदोलन संचालित किया जिसका लक्ष्य वन विकास और संरक्षण है।

3. शान्त घाटी आंदोलन - केरल प्रांत में जल विद्धुत परियोजना की स्थापना के विरोध में इसलिए यह जन चेतना आंदोलन प्रारम्भ हुआ क्योंकि इससे जैव विविधता को क्षति हो रही थी। इसलिए शासन ने वहाँ आरक्षित वन क्षेत्र घोषित कर पुनः उष्ण कटिबंधीय वनो के क्षेत्र में जैव विविधता को समृद्ध बनाने हेतु संरक्षण किया है।

4. नर्मदा बचाओ आंदोलन - मेघा पाटेकर अपने सहयोगी अरुंधती राय और बाबा आमटे के साथ यह आंदोलन जैव विविधता और आदिवासियों  के संरक्षण हेतु संचालित कर रहे हैं। 

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